इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि यदि सरकार ने जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं लिया है, तो सीलिंग एक्ट लागू नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल खतौनी में नाम दर्ज होने से स्वामित्व साबित नहीं होता, और मुरादाबाद के एक 45 साल पुराने मामले में किसानों को राहत दी।
खतौनी में नाम दर्ज होने से ही नहीं साबित होता है स्वामित्व', हाई कोर्ट ने किसान के पक्ष में सुनाया फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि यदि सरकार ने जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं लिया है, तो सीलिंग एक्ट लागू नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल खतौनी में नाम दर्ज होने से स्वामित्व साबित नहीं होता, और मुरादाबाद के एक 45 साल पुराने मामले में किसानों को राहत दी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने जमीन का वास्तविक कब्जा लिया ही नहीं तो सीलिंग एक्ट लागू नहीं होगा। कुछ समय तक खतौनी में सरकार का नाम दर्ज होने से भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह भूमि की मालिक है।
सिर्फ राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज होने से स्वामित्व साबित नहीं होता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव व न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने रामऔतार व अन्य की वर्ष 2010 में दायर याचिका स्वीकार करते हुए मुरादाबाद के सोनकपुर गांव में सीलिंग में सरप्लस जमीन पर सरकारी कार्रवाई को रद कर दिया है। लगभग 45 साल पुराने अर्बन लैंड सीलिंग केस में याची किसानों के पक्ष में निर्णय हुआ है।
प्रकरण गांव सोनकपुर के गाटा नंबर 773 और 789 की 7114.40 वर्गमीटर जमीन से जुड़ा है। याची गोकुल के बेटे-पोते हैं। उनका कहना है कि 1976 के अर्बन लैंड सीलिंग एक्ट के तहत 26 जुलाई 1980 को धारा 8(4) में आदेश उनके पूर्वजों को बिना बताए पारित कर दिया गया।
उन्होंने कोर्ट में खतौनी फसली वर्ष 1382-87 और 1414-1419 पेश की। इसमें जमीन लगातार उनके और उनके पूर्वजों के नाम थी। याचीगण की ओर से कहा गया कि 27 अगस्त 1984 का जो कब्जा मेमो सरकार दिखा रही है, उस पर न तो जमीन मालिकों के दस्तखत हैं और न ही किसी गवाह के। इसलिए वह दस्तावेज फर्जी है।
सबसे मजबूत दलील यह थी कि जमीन मुरादाबाद नगर पालिका की सीमा से एक किलोमीटर के दायरे से बाहर है। नायब तहसीलदार की आठ फरवरी 1979 और 10 मई 1979 की रिपोर्ट में गाटा नंबर 612 से 882 तक की जमीन को शहरी सीमा से बाहर माना गया था।
इसी आधार पर पहले भी गाटा नंबर 798 को चार अगस्त 2016 को डीएम ने सीलिंग एक्ट से छूट दे दी थी।कोर्ट ने कहा कि कब्जा साबित करने का भार सरकार पर था, लेकिन इसमें वह पूरी तरह नाकाम रही। अदालत ने माना कि न तो धारा 10 के तहत कब्जा लेने की प्रक्रिया पूरी हुई और ना ही किसानों ने स्वेच्छा से जमीन का समर्पण किया।
कोर्ट ने कहा कि अर्बन लैंड सीलिंग रिपील एक्ट 1999 की धारा 4 का लाभ याची को मिलेगा। इस क्रम में सुप्रीम कोर्ट के हरि राम बनाम स्टेट आफ यूपी में दिए गए निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वास्तविक कब्जा नहीं लिया गया है तो सिर्फ देरी के आधार पर याचिका खारिज नहीं की जा सकती।
अर्बन लैंड सीलिंग एक्ट 1976 में शहरों में जमीन की जमाखोरी रोकने के लिए लाया गया था, जिसे 1999 में निरस्त कर दिया गया।
Suresh Kumar Patel
Advocate & Senior Associate
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