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हत्या के प्रयास के अपराध की विवेचना करने के नियम

दीपक कुमार पटेल 10 May 2026

भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय 16 की धारा 307 [भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 109] व धारा 308 [भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 110] में हत्या के प्रयास के अपराध को वर्णित किया गया है। आत्महत्या का प्रयास करना धारा 309 भा.दं.वि. [भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 226] के तहत दण्डनीय है।

हत्या के प्रयास के अपराध की विवेचना Investigation of Cases of Attempt to Murder भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय 16 की धारा 307 [भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 109] व धारा 308 [भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 110] में हत्या के प्रयास के अपराध को वर्णित किया गया है। आत्महत्या का प्रयास करना धारा 309 भा.दं.वि. [भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 226] के तहत दण्डनीय है। भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधान धारा 307 [धारा 109 भारतीय न्याय संहिता] – हत्या करने का प्रयास जो कोई किसी कार्य को ऐसे आशय या ज्ञान से और ऐसी परिस्थितियों में करेगा कि यदि वह उस कार्य द्वारा मृत्यु कारित कर देता तो वह हत्या का दोषी होता, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। यदि ऐसे कार्य द्वारा किसी व्यक्ति को उपहति (चोट) कारित हो जाए, तो वह अपराधी आजीवन कारावास से या ऐसे दण्ड से दण्डनीय होगा, जैसा पूर्व में वर्णित है। आजीवन सिद्धदोष द्वारा प्रयास यदि इस धारा में वर्णित अपराध करने वाला कोई व्यक्ति पहले से आजीवन कारावास के दण्डादेश के अधीन हो, और यदि उपहति कारित हुई हो, तो उसे मृत्युदण्ड भी दिया जा सकेगा। इसे भी जानें - FIR और Complaint में क्या अंतर होता है। उदाहरण (1) ‘य’ का वध करने के आशय से ‘क’ उस पर ऐसी परिस्थितियों में गोली चलाता है कि यदि मृत्यु हो जाती, तो ‘क’ हत्या का दोषी होता। ‘क’ इस धारा के अधीन दण्डनीय है। (2) ‘क’ कोमल अवस्था के शिशु की मृत्यु करने के आशय से उसे एक निर्जन स्थान में असुरक्षित छोड़ देता है। ‘क’ ने इस धारा द्वारा परिभाषित अपराध किया है, यद्यपि परिणामस्वरूप उस शिशु की मृत्यु नहीं होती। (3) ‘य’ की हत्या का आशय रखते हुए ‘क’ एक बन्दूक खरीदता है और उसको भरता है। ‘क’ ने अभी तक अपराध नहीं किया है। जब ‘क’ बन्दूक चलाता है, तब उसने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है। यदि इस प्रकार गोली मारकर वह ‘य’ को घायल कर देता है, तो वह इस धारा के प्रथम पैरे में वर्णित दण्ड से दण्डनीय होगा। (4) विष द्वारा ‘य’ की हत्या करने का आशय रखते हुए ‘क’ विष खरीदता है और उसे भोजन में मिला देता है, जो उसके अपने पास रहता है। ‘क’ ने इस धारा में परिभाषित अपराध अभी तक नहीं किया है। जब ‘क’ उस भोजन को ‘य’ की मेज पर रखता है, या उसे वहाँ रखने के लिए सेवकों को सौंपता है, तब वह इस धारा में परिभाषित अपराध करता है। धारा 308 [धारा 110 भारतीय न्याय संहिता] – आपराधिक मानव वध करने का प्रयास जो कोई किसी कार्य को ऐसे आशय या ज्ञान से और ऐसी परिस्थितियों में करेगा कि यदि उस कार्य से वह मृत्यु कारित कर देता, तो वह हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव वध का दोषी होता, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा और यदि ऐसे कार्य द्वारा किसी व्यक्ति को उपहति हो जाए तो वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। उदाहरण क गंभीर और अचानक प्रकोपन पर, ऐसी परिस्थितियों में, ‘क’ ‘य’ पर पिस्तौल चलाता है कि यदि उससे वह मृत्यु कारित कर देता, तो वह हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव वध का दोषी होता। ‘क’ ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है। धारा 309 [धारा 226 भारतीय न्याय संहिता] — आत्महत्या करने का प्रयत्न जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा, और उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा, वह साधारण कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। हत्या के प्रयास हेतु प्रायः घातक आयुधों का प्रयोग किया जाता है। आग्नेयास्त्र का प्रयोग बहुतायत होता है। इस प्रकार के अपराध में घायल व्यक्ति जिसकी हत्या का प्रयास किया गया है महत्वपूर्ण साक्षी होता है। इस प्रकार के अपराध की विवेचना में निम्न बातों का ध्यान रखा जाये (i) घटना की सूचना मिलने पर तत्काल घटनास्थल पर पहुँचें। (ii) घटनास्थल पर मौजूद घायल व्यक्ति को तत्काल मेडिको-लीगल परीक्षण हेतु अस्पताल भेजें। यदि मरणासन्न हो, तो उसका मृत्यु कालिक कथन मजिस्ट्रेट से दर्ज कराया जाये। (iii) घटनास्थल पर मौजूद रक्त, छर्रे, खोखा, कारतूस, बुलेट, घायल के वस्त्र जो भी हों, उसे कब्जे में लिया जाये। भाला, फरसा, लाठी-डण्डा, लोहे की रॉड आदि भी हों तो उसे कब्जे में लिया जाये। कब्जे की फर्द बनायी जाये। (iv) वादी व मजरूब (घायल) का बयान तत्काल दर्ज किया जाये। फर्द के गवाहों का भी बयान दर्ज किया जाये। (v) घटना के चश्मदीद गवाहों व स्वतंत्र गवाहों का बयान भी दर्ज किया जाये। घटनास्थल का स्पष्ट नक्शा बनाया जाये। (vi) घटना में प्रयुक्त अग्नेय आयुध की बरामदगी की जाये। (vii) मेडिको-लीगल करने वाले डॉक्टर का बयान दर्ज किया जाये। (viii) अभियुक्तों की गिरफ्तारी करने का प्रयास किया जाना चाहिए। (ix) गिरफ्तारी न होने पर 82/83 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत कार्यवाही की जाये। (x) घायल के वस्त्रों व घटनास्थल से कब्जे में ली गयी वस्तुओं (अग्नेय आयुध आदि) का विधि-विज्ञान प्रयोगशाला से परीक्षण कराया जाये। (xi) घटना के मोटिव (कारण व उद्देश्य) की जानकारी करके उसे केस डायरी में अंकित किया जाये। (xii) साक्ष्य संकलित करके समय से आरोप-पत्र न्यायालय में प्रेषित किया जाये तथा आरोप-पत्र में साक्षीगण के समक्ष यह अंकित किया जाये कि वह किस कोटि का साक्षी है। नोट: धारा 308, भा.दं.वि. [धारा 110 भारतीय न्याय संहिता] के संबंध में अक्सर विशिष्टाभास रहता है कि यह धारा अपराध में लागू हो रही है या नहीं। यदि मारपीट में मजरूब (घायल) के सिर में काफी गहरी चोट है, फ्रैक्चर है तथा वह चोट से अचेत होकर अचेतावस्था (Unconscious) में ही अस्पताल में भर्ती हुआ है तथा उसकी चिकित्सकीय परीक्षण रिपोर्ट में डॉक्टर ने उसे अचेतावस्था में भर्ती किया जाना लिखा है और चोटों की प्रकृति इतनी गंभीर है कि उससे उस घायल व्यक्ति की मृत्यु संभाव्य हो तो धारा 308 भा० द० वि० की धाराएँ लागू होंगी। धारा 308 भा० द० वि० के अन्तर्गत यह स्पष्ट लिखा गया है कि आपराधिक मानव-वध जो हत्या नहीं है, का प्रयत्न जिसकी प्रकृति और धारा 307 के अन्तर्गत अपराध प्रकृति में पर्याप्त समानता है, धारा 308 के अधीन दण्डनीय है। इसे भी जानें - "पटेल लॉ चैंबर्स" उत्तर प्रदेश की सबसे बेस्ट लीगल सर्विस देने वाली लॉ फर्म धरा 309 भाo दo विo (धारा 226 BNSS भारतीय न्याय संहिता 2023) आत्महत्या के प्रयत्न को दण्डित बनाती है। यह धारा तब लागू होती है जब अभियुक्त आत्महत्या का प्रयत्न करे और उस अपराध के करने के लिए कार्य करे। भा० द० संहिता में यह अकेली धारा है जिसमें दण्ड तभी दिया जा सकेगा जब अभियुक्त के द्वारा किया गया कार्य सफल न होकर विफल हो। ऐसे मामले यद्यपि कि यदा-कदा ही थानों में दर्ज होते हैं, पर ऐसे मामलों के दर्ज होने पर निम्न कार्यवाही करनी चाहिए- (i) घटनास्थल पर तत्काल पहुँचें। घटनास्थल की फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी तत्काल करायें। (ii) आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति का बयान तत्काल दर्ज करें तथा उससे ऐसा करने का कारण व उद्देश्य ज्ञात करें। (iii) यदि रस्सी आदि से गला घोंटकर आत्महत्या का प्रयास किया गया है तो उसे कब्जे में लें। कब्जे में लेने की फर्द तैयार करें। (iv) यदि दवा (ड्रग्स) लेकर आत्महत्या का प्रयास किया गया है, तो तुरंत व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती कराकर डॉक्टर से मेडिको-लीगल परीक्षण करायें तथा घटनास्थल से उस ड्रग का पैकेट, शीशी या बोतल खोजकर कब्जे में ले लें तथा उसकी भी फर्द बना लें। (v) घर वालों, मित्रों व अन्य नजदीकी लोगों का बयान उस व्यक्ति के बारे में दर्ज करें तथा उसकी मनोदशा की भी जानकारी करें कि वह ऐसा करने के लिए क्यों उद्यत हुआ। (vi) घटनास्थल का नक्शा तैयार करें। (vii) मेडिको-लीगल करने वाले डॉक्टर का बयान दर्ज करें। (viii) कब्जे में ली गयी वस्तुओं का विधि विज्ञान प्रयोगशाला से परीक्षण करायें। (ix) समय से आरोप-पत्र न्यायालय में प्रेषित करें। आत्महत्या के प्रयास पर उच्चतम न्यायालय के दो महत्वपूर्ण निर्णय आत्महत्या के प्रयास पर उच्चतम न्यायालय के दो महत्वपूर्ण निर्णय उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309 को असंवैधानिक करार दे दिया था। उड़ीसा के नागभूषण पट्नायक तथा पी० रत्नम की दो रिट याचिकाओं की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश आर० एम० सहाय तथा बी० एल० हंसारिया ने यह निर्णय दिया। न्यायाधीशों ने कहा कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309 संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो जीवन का मूल अधिकार देता है। न्यायाधीश की खण्डपीठ ने तो यहाँ तक कह दिया कि धारा 309 को भारतीय दण्ड संहिता से निकाल ही देना चाहिए, ताकि इसे और अधिक मानवीय बनाया जा सके। न्यायाधीशों ने कहा कि आत्महत्या को किसी धर्म, नैतिकता अथवा लोकनीति के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता। इससे न तो समाज पर कोई दुष्प्रभाव पड़ता है और न ही किसी को नुकसान होता है। न्यायाधीशों ने अपने निर्णय के समर्थन में कई उदाहरण दिये। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए बताया कि वे मृत्यु को अपना मित्र मानते थे। उनकी दृष्टि में मृत्यु पीड़ाओं से मुक्ति प्रदान करती है। एक इंग्लिश कवि को उद्धृत करते हुए कहा कि- "मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपनी आत्मा का वही मालिक है।" निःसन्देह उच्चतम न्यायालय का यह एक ऐतिहासिक निर्णय है। इसी मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है कि यह धारा के उपबन्ध बर्बर एवं अविवेकशील (Cruel and irrational) हैं। ये संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुरूप नहीं हैं। इसे भी जानें - क्या पिता अपनी पूरी सम्पत्ति किसी एक बेटे के नाम कर सकता है? जाने क्या है इसके नियम उच्चतम न्यायालय ने पूर्व निर्णय को पलटा उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की एक पीठ ने अपने पूर्व निर्णय को पलटते हुए यह व्यवस्था दी कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309 संवैधानिक है और उसके अन्तर्गत आत्महत्या करने का प्रयत्न दण्डनीय अपराध है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता में मरने का अधिकार सम्मिलित नहीं है। इस प्रकार अब भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309 का प्रभाव यथावत रहेगा। श्रीमती ज्ञान कौर बनाम स्टेट ऑफ पंजाब का मामला— यह वही मामला है जिसमें उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय को उलटा है। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि संहिता की धारा 309 के उपबंध संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करते हैं। जीने के अधिकार में मरने का अधिकार सम्मिलित नहीं है। जीवन की सुरक्षा में जीवन का अन्त सन्निहित नहीं है। हथियारों एवं गोला-बारूद का विवरण हत्या के प्रयास हेतु प्रायः तमंचा (कट्टा), रिवाल्वर, पिस्टल या राइफल या बन्दूक का प्रयोग किया जाता है। तमंचा, पिस्टल, रिवाल्वर, बन्दूक, राइफल आदि सिंगल शॉट आग्नेयास्त्र हैं। इंसास, एस.एल.आर., सब-मशीनगन आदि अर्ध-स्वचालित आग्नेयास्त्र हैं तथा मशीनगन, AK-47, AK-56, कार्बाइन आदि स्वचालित आग्नेयास्त्र हैं। कारतूस में काला पाउडर होता है जिसमें सोडियम नाइट्रेट, गंधक व लकड़ी के कोयले का अनुपात क्रमशः 75 : 15 : 10 होता है। जिन कारतूसों में धुआं रहित बारूद होता है उसमें मुख्यतया नाइट्रो ग्लिसरीन एवं नाइट्रो सेलुलोज का मिश्रण होता है। इसमें बारूद को उपयुक्त बनाने के लिए बेरियम नाइट्रेट, पोटैशियम डाइक्रोमेट, ग्रेफाइट, लकड़ी का बुरादा एवं वेसलीन का प्रयोग भी किया जाता है। भार और बनावट: 12 बोर के कारतूस में छरों का औसत भार 30 ग्राम होता है। राइफल की बुलेट के ऊपर तांबे अथवा तांबा निकल या स्टील का जैकेट रहता है। इसलिए इन्हें 'जैकेटेड बुलेट' कहते हैं। कैलिबर (Caliver): आधुनिक कारतूसों का खोल सामान्यतया पीतल का होता है। पिस्टल के कारतूस: 5.6 mm, 7.65 mm, 9.0 mm राइफल: 2.62 mm मस्कट: 10.75 mm रिवाल्वर: 11.25 mm प्रभाव: सामान्य 12 बोर की शॉटगन से दो मीटर से कम दूरी होने पर सारे छर्रे एक साथ, एक ही स्थान में प्रवेश कर जाते हैं जिसमें व्यास लगभग 2 से 3 इंच तक हो सकता है। दो से सात मीटर की दूरी से फायर होने पर भी एक बड़ा छिद्र बनता है, जिसके चारों ओर अन्य छर्रों के छिद्र भी होते हैं, जबकि 10 मीटर से अधिक दूरी होने पर प्रत्येक छर्रा अलग छिद्र निर्मित करता है। प्रतिबंधित बोर (Prohibited Bore) आग्नेयास्त्र के निम्न बोर प्रतिबंधित बोर की श्रेणी में आते हैं:- .38 बोर रिवाल्वर, 357 बोर रिवाल्वर, .45 बोर रिवाल्वर, .455 रिवाल्वर, .455 वेस्ली रिवाल्वर, .476 बोर रिवाल्वर, 9 MM पिस्तल, .47 ACP पिस्तल, 9 MM लुगर पिस्तल, 45 रिमलेस पिस्तल, 7.63 MM रायफल, 7.62 (नाटो) रायफल, .303 बोर रायफल, 30 बोर कार्बाइन रायफल, .38 SW लांग रिवाल्वर, .30 Mi रायफल (कार्बाइन), 45 बोर थामसन सब मशीनगन, .9 MM कार्बाइन स्टेनगन, .380 रिक्ड रिवाल्वर। लेखक दीपक कुमार पटेल अधिवक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद Principal Advocate Patel Law Chambers.

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