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हत्या के अपराध की विवेचना करने का नियम

DEEPAK KUMAR PATEL (Principal Advocate At Patel Law Chambers) 22 May 2026

भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत वर्णित अपराधों में हत्या का अपराध सबसे जघन्य अपराध माना गया है। भा० द० वि० के अध्याय 16 [भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय 6] में धारा 299 भा० द० वि० [धारा 100 से धारा 105 भारतीय न्याय संहिता, 2023] से लेकर धारा 304 भा० द० वि० तक हत्या की विभिन्न परिस्थितियों का वर्णन किया गया है। धारा 299. [धारा 100 भारतीय न्याय संहिता, 2023]—आपराधिक मानव वध—जो कोई मृत्यु कारित करने के आशय से, या ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से जिससे मृत्यु कारित हो जाना सम्भाव्य हो, या यह ज्ञान रखते हुये कि यह सम्भाव्य है कि वह उस कार्य से मृत्यु कारित कर दे, कोई कार्य करके मृत्यु कारित कर देता है, वह आपराधिक मानव वध का अपराध करता है।

हत्या के अपराध की विवेचना (INVESTIGATION OF CASES OF HOMICIDE) भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत वर्णित अपराधों में हत्या का अपराध सबसे जघन्य अपराध माना गया है। भा० द० वि० के अध्याय 16 [भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय 6] में धारा 299 भा० द० वि० [धारा 100 से धारा 105 भारतीय न्याय संहिता, 2023] से लेकर धारा 304 भा० द० वि० तक हत्या की विभिन्न परिस्थितियों का वर्णन किया गया है। धारा 299. [धारा 100 भारतीय न्याय संहिता, 2023]—आपराधिक मानव वध—जो कोई मृत्यु कारित करने के आशय से, या ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से जिससे मृत्यु कारित हो जाना सम्भाव्य हो, या यह ज्ञान रखते हुये कि यह सम्भाव्य है कि वह उस कार्य से मृत्यु कारित कर दे, कोई कार्य करके मृत्यु कारित कर देता है, वह आपराधिक मानव वध का अपराध करता है। दृष्टान्त (क) 'क' एक गड्ढे पर लकड़ियाँ और घास इस आशय से बिछाता है कि ‘य’ द्वारा मृत्यु कारित करे या यह ज्ञान रखते हुए बिछाता है कि संभव है कि ‘य’ द्वारा मृत्यु कारित हो। 'य' यह विश्वास करते हुए कि वह भूमि सुदृढ़ है उस पर चलता है, उसमें गिर पड़ता है और मारा जाता है। 'क' ने आपराधिक मानव वध का अपराध किया है। (ख) 'क' यह जानता है कि 'य' एक झाड़ी के पीछे है। 'ख' यह नहीं जानता। 'य' की मृत्यु करने के आशय से या यह जानते हुए कि उससे 'य' की मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है, 'ख' को उस झाड़ी पर गोली चलाने के लिए 'क' उत्प्रेरित करता है। 'ख' गोली चलाता है और 'य' को मार डालता है। यहाँ यह हो सकता है कि 'ख' किसी भी अपराध का दोषी न हो, किन्तु 'क' ने आपराधिक मानव वध का अपराध किया है। (ग) 'क' एक मुर्गे को मार डालने और उसे चुरा लेने के आशय से उस पर गोली चलाकर 'ख' को, जो एक झाड़ी के पीछे है, मार डालता है, किन्तु 'क' यह नहीं जानता था कि 'ख' वहाँ है। यहाँ, यद्यपि 'क' विधि-विरुद्ध कार्य कर रहा था, तथापि वह आपराधिक मानववध का दोषी नहीं है क्योंकि उसका आशय 'ख' को मार डालने का, या कोई ऐसा कार्य करके, जिससे मृत्यु कारित करना वह सम्भाव्य जानता हो, मृत्यु कारित करने का नहीं था। स्पष्टीकरण 1- वह व्यक्ति, जो किसी दूसरे व्यक्ति को, जो किसी विकार रोग या अंग-शैथिल्य से ग्रस्त है, शारीरिक क्षति कारित करता है और तद्द्वारा उस दूसरे व्यक्ति की मृत्यु त्वरित कर देता है, उसकी मृत्यु कारित करता है, यह समझा जाएगा। स्पष्टीकरण 2- जहाँ कि शारीरिक क्षति से मृत्यु कारित की गई हो, वहाँ जिस व्यक्ति ने, ऐसी शारीरिक क्षति कारित की हो, उसने वह मृत्यु कारित की है, यह समझा जाएगा, यद्यपि उचित उपचार और कौशलपूर्ण चिकित्सा करने से वह मृत्यु रोकी जा सकती थी। स्पष्टीकरण 3- मां के गर्भ में स्थित किसी शिशु की मृत्यु कारित करना मानव वध नहीं है। किन्तु किसी जीवित शिशु की मृत्यु कारित करना आपराधिक मानव वध की कोटि में आ सकेगा, यदि उस शिशु का कोई भाग बाहर निकल आया हो, यद्यपि उस शिशु ने श्वास न ली हो या वह पूर्णतः उत्पन्न न हुआ हो। धारा 300. [धारा 101 भारतीय न्याय संहिता]-हत्या- कुछ अपवादित दशाओं को छोड़कर आपराधिक मानववध हत्या है, यदि वह कार्य, जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई हो, मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो, अथवा। दूसरा- यदि वह ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया हो जिससे अपराधी जानता हो कि उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है, जिसको वह अपहानि कारित की गई है, अथवा। तीसरा- यदि वह किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया हो और वह शारीरिक क्षति, जिसके कारित करने का आशय हो, प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त हो, अथवा। चौथा- यदि कार्य करने वाला व्यक्ति यह जानता हो कि वह कार्य इतना आसन्न संकट है कि पूरी अधिसम्भाव्यता है कि वह मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर ही देगा जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है और वह मृत्यु कारित करने या पूर्वोक्त रूप की क्षति कारित करने की जोखिम उठाने के लिए किसी प्रतिहेतु के बिना ऐसा कार्य करे। दृष्टान्त (क) 'य' को मार डालने के आशय से 'क' उस पर गोली चलाता है, परिणामस्वरूप 'य' मृत हो जाता है। 'क' हत्या करता है। (ख) 'क' यह जानते हुये कि 'य' ऐसे रोग से ग्रस्त है कि सम्भाव्य है कि एक प्रहार उसकी मृत्यु कारित कर दे, शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से उस पर आघात करता है। 'य' उस प्रहार के परिणामस्वरूप मृत हो जाता है। 'क' हत्या का दोषी है, यद्यपि वह प्रहार किसी अच्छे स्वस्थ व्यक्ति की मृत्यु करने के लिए प्रकृति के मामूली अनुक्रम में पर्याप्त न होता। किन्तु यदि 'क', यह न जानते हुए कि 'य' किसी रोग से ग्रस्त है, उस पर ऐसा प्रहार करता है, जिससे कोई अच्छा स्वस्थ व्यक्ति प्रकृति के मामूली अनुक्रम में न मृत होता, तो यहाँ, 'क', यद्यपि शारीरिक क्षति कारित करने का उसका आशय हो, हत्या का दोषी नहीं है, यदि उसका आशय मृत्यु कारित करने का या ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने का नहीं था, जिससे प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित हो जाये। (ग) 'य' को तलवार या लाठी से ऐसा घाव 'क' साशय करता है, जो प्रकृति के मामूली अनुक्रम में किसी मनुष्य की मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त है। परिणामस्वरूप 'य' की मृत्यु कारित हो जाती है, यहाँ 'क' हत्या का दोषी है, यद्यपि उसका आशय 'य' की मृत्यु कारित करने का (न) हो। 'क' किसी प्रतिहेतु के बिना व्यक्तियों के एक समूह पर भरी हुई तोप चलाता है और उनमें से एक का वध कर देता है। 'क' हत्या का दोषी है, यद्यपि किसी विशिष्ट व्यक्ति की मृत्यु कारित करने की उसकी पूर्वचिन्तित परिकल्पना न रही हो। अपवाद 1- आपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है- आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि अपराधी उस समय जब कि वह गम्भीर और अचानक प्रकोपन में आत्म-संयम की शक्ति से वंचित हो, उस व्यक्ति की, जिसने कि वह प्रकोपन दिया था मृत्यु कारित करे या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल या दुर्घटनावश कारित करे। ऊपर का अपवाद निम्नलिखित परन्तुकॉ के अध्यधीन है। पहला- यह कि वह प्रकोपन किसी व्यक्ति का वध करने या अपहानि करने के लिए अपराधी द्वारा प्रतिहेतु(बदला)के रूप में इप्सित न हो या स्वेच्छया प्रकोपित न हो। दूसरा- यह कि वह प्रकोपन किसी ऐसी बात द्वारा न दिया गया हो जो विधि के पालन में या लोक सेवक द्वारा ऐसे लोक सेवक की शक्तियों के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई हो। तीसरा- यह कि वह प्रकोपन किसी ऐसी बात द्वारा न दिया गया हो, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई हो। स्पष्टीकरण- प्रकोपन इतना गम्भीर और अचानक था या नहीं कि अपराध को हत्या की कोटि में जाने से बचा दे, यह तथ्य का प्रश्न है। दृष्टान्त (क) 'य' द्वारा दिए गए प्रकोपन के कारण प्रदीप्त आवेश के असर में 'म' का, जो 'य' का शिशु है, 'क' साशय वध करता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन उस शिशु द्वारा नहीं दिया गया था और उस शिशु की मृत्यु उस प्रकोपन से किए गये कार्य को करने में दुर्घटना या दुर्भाग्य से नहीं हुई है। (ख) 'क' को 'म' गम्भीर और अचानक प्रकोपन देता है। 'क' इस प्रकोपन से 'म' पर पिस्तौल चलाता है, जिसमें न तो उसका आशय 'य' का, जो समीप ही है, किन्तु दृष्टि से बाहर है, वध करने का है, और न वह यह जानता है कि सम्भाव्य है कि वह 'य' का वध कर दे। 'क', 'य' का वध करता है। यहाँ, 'क' ने हत्या नहीं की है, किन्तु केवल आपराधिक मानव वध किया है। (ग) 'य' द्वारा, जो एक बेलिफ है, 'क' विधिपूर्वक गिरफ्तार किया जाता है। उस गिरफ्तारी के कारण 'क' को अचानक और तीव्र आवेश आ जाता है और वह 'य' का वध कर देता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन ऐसी बात द्वारा दिया गया था, जो एक लोक सेवक द्वारा उसकी शक्ति के प्रयोग में की गयी थी। (घ) 'य' के समक्ष, जो एक मजिस्ट्रेट है, साक्षी के रूप में 'क' उपसंजात होता है। 'य' यह कहता है कि वह 'क' के अभिसाक्ष्य के एक शब्द पर भी विश्वास नहीं करता और यह कि 'क' ने शपथ भंग किया है। 'क' को इन शब्दों से अचानक आवेश आ जाता है और वह 'य' का वध कर देता है। यह हत्या है। (ङ) 'य' की नाक खींचने का प्रयत्न 'क' करता है। 'य' प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में ऐसा करने से रोकने के लिए 'क' को पकड़ लेता है। परिणामस्वरूप 'क' को अचानक और तीव्र आवेश आ जाता है और वह 'य' का वध कर देता है। यह हत्या है। क्योंकि प्रकोपन ऐसी बात द्वारा दिया गया था जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई थी। (च) 'ख' पर 'य' आघात करता है। 'ख' को इस प्रकोपन से तीव्र क्रोध आ जाता है। 'क', जो निकट ही खड़ा हुआ है, 'ख' के क्रोध का लाभ उठाने और उससे 'य' का वध कराने के आशय से उसके हाथ में एक छुरी उस प्रयोजन के लिए दे देता है। 'ख' उस छुरी से 'य' का वध कर देता है। यहाँ 'ख' ने चाहे केवल आपराधिक मानव वध ही किया हो, किन्तु 'क' हत्या का दोषी है। अपवाद 2- आपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है। यदि अपराधी, शरीर या सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार को सद्भावपूर्वक प्रयोग में लाते हुए विधि द्वारा उसे दी गई शक्ति का अतिक्रमण कर दे, और पूर्वचिन्तन बिना और ऐसी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से जितनी अपहानि करना आवश्यक हो उससे अधिक अपहानि करने के किसी आशय के बिना उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर दे जिसके विरुद्ध वह प्रतिरक्षा का ऐसा अधिकार प्रयोग में ला रहा हो। दृष्टान्त 'क' को चाबुक मारने का प्रयत्न 'य' करता है, किन्तु इस प्रकार नहीं कि 'क' को घोर उपहति कारित हो। 'क' एक पिस्तौल निकाल लेता है। 'य' हमले को चालू रखता है। 'क' सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि वह अपने को चाबुक लगाये जाने से किसी अन्य साधन द्वारा नहीं बचा सकता है, गोली से 'य' का वध कर देता है। 'क' ने हत्या नहीं की है, किन्तु केवल आपराधिक मानव वध किया है। अपवाद 3- आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह अपराधी ऐसा लोक सेवक होते हुए, या ऐसे लोक सेवक को मदद देते हुए, जो लोक न्याय की अग्रसरता में कार्य कर रहा है, उसे विधि द्वारा दी गई शक्ति से आगे बढ़ जाए, और कोई ऐसा कार्य करके जिसे वह विधिपूर्ण और ऐसे लोक सेवक के नाते उसके कर्तव्य के सम्यक् निर्वहन के लिए आवश्यक होने का सद्भावपूर्वक विश्वास करता है, और उस व्यक्ति के प्रति, जिसकी कि मृत्यु कारित की गई है, वैमनस्य के बिना मृत्यु कारित करे। अपवाद 4- आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है यदि मानव वध अचानक झगड़ाजनित आवेश की तीव्रता में हुई अचानक लड़ाई में पूर्वचिन्तन बिना और अपराधी द्वारा अनुचित लाभ उठाए बिना या क्रूरतापूर्ण या अप्रायिक रीति से कार्य किए बिना किया गया हो। स्पष्टीकरण- ऐसी दशाओं में यह तत्वहीन है कि कौन पक्ष प्रकोपन देता है या पहला हमला करता है। अपवाद 5- आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह व्यक्ति जिसकी मृत्यु कारित की जाये, अठारह वर्ष से अधिक आयु का होते हुए, अपनी सम्मति से मृत्यु होना सहन करे, या मृत्यु की जोखिम उठाए। दृष्टान्त 'य' को, जो अठारह वर्ष से कम आयु का है, उकसाकर 'क' उससे स्वेच्छया आत्महत्या करवाता है। यहाँ कम उम्र होने के कारण 'य' अपनी मृत्यु के लिए सम्मति देने में असमर्थ था, इसलिए 'क' ने हत्या का दुष्प्रेरण किया है। धारा 301. [धारा 102 भारतीय न्याय संहिता]- जिस व्यक्ति की मृत्यु कारित करने का आशय था, उससे भिन्न व्यक्ति की मृत्यु करके आपराधिक मानव वध- यदि कोई व्यक्ति कोई ऐसी बात करने द्वारा, जिससे उसका आशय मृत्यु कारित करना हो, या जिससे वह जानता हो कि मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है, किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करके, जिसकी मृत्यु कारित करने का न तो उसका आशय हो और न वह यह सम्भाव्य जानता हो कि वह उसकी मृत्यु कारित करेगा, आपराधिक मानव वध करे, तो अपराधी द्वारा किया गया आपराधिक मानव वध उस भांति का होगा जिस भांति का वह होता, यदि वह उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करता जिसकी मृत्यु कारित करना उसके द्वारा आशयित था या वह जानता था कि उसके द्वारा उसकी मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है। धारा 302. [धारा 103 भारतीय न्याय संहिता]- हत्या के लिए दण्ड- जो कोई हत्या करेगा, वह मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। धारा 303. [धारा 104 भारतीय न्याय संहिता]- आजीवन सिद्धदोष द्वारा हत्या के लिए दण्ड- जो कोई आजीवन कारावास के दण्डादेश के अधीन होते हुए हत्या करेगा, वह मृत्यु से दण्डित किया जाएगा। धारा 304. [धारा 105 भारतीय न्याय संहिता]- हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव वध के लिए दण्ड- जो कोई ऐसा आपराधिक मानव वध करेगा, जो हत्या की कोटि में नहीं आता है, यदि वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई है, मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति, जिससे मृत्यु होना सम्भाव्य है, कारित करने के आशय से किया जाए, तो वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा; अथवा यदि वह कार्य इस ज्ञान के साथ कि उससे मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है, किन्तु मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति, जिससे मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है, कारित करने के किसी आशय के बिना किया जाये, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जायेगा। टिप्पणी हत्या की कोटि में न आने वाला आपराधिक मानव वध- अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित नहीं- अभियुक्त की हठी आदतें अभियुक्त और उसकी मृतक पत्नी के बीच खुली लड़ाई में परिणत हुये थे। घटना के दिन, लड़ाई के कारण मृतका ने अपने ऊपर किरोसीन उड़ेल लिया। अभियुक्त ने माचिस की तीली जलाई थी, जिसके फलस्वरूप अग्नि जलने लगी और मृतका के शरीर पर 60 प्रतिशत जलना कारित हुई, जो उसकी मृत्यु को प्रेरित किया। मृतका द्वारा किया गया स्वयं अपनी इच्छा शक्ति पर किया गया मृत्युकालिक कथन जो घटना के डेढ़ घण्टे पश्चात् तत्काल अभिलिखित किया गया। अभियुक्त को फंसाया था। न्यायालय ने कथित मृत्युकालिक कथन को स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं पाया। धारा 304, भाग 1 के अन्तर्गत अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित थी- अंगोले रवीकान्थ बनाम स्टेट ऑफ ए० पी०, 2009 क्रि० लॉ ज० 3944 (एससी) : (2009) 13 एस० सी० सी० 647। धारा 304-क. [धारा 106 भारतीय न्याय संहिता]--उपेक्षा द्वारा मृत्यु कारित करना- जो कोई उतावलेपन के या उपेक्षापूर्ण किसी ऐसे कार्य से किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करेगा, जो आपराधिक मानव वध की कोटि में नहीं आता, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। हत्या में मृत्यु के विभिन्न कारण मृत्यु के मुख्यतः निम्न तीन कारण होते हैं- कोमा (Coma)- जब व्यक्ति का मस्तिष्क कार्य करना बन्द कर देता है। जैसे- सिर में गंभीर चोट से रक्तस्राव-फ्रैक्चर आने से। मूर्च्छा या सिनकोप (Syncope)- जब व्यक्ति का हृदय कार्य करना बन्द कर देता है। जैसे- शॉक (हृदय पर अचानक दबाव), चोट के कारण अचानक अत्यधिक रक्तस्राव से, शरीर को तेज झटका लगने से या अधिक ऊँचाई से अचानक गिरने से। श्वास अवरोध (Asphyxia)- जब श्वसन तंत्र को ऑक्सीजन की आपूर्ति बन्द हो जाती है, जिससे हृदय कार्य करना बन्द कर देता है। जैसे- फांसी लगने से, गला घोंटने से, मुंह व नाक को बन्द कर देने से, छाती पर अत्यधिक दबाव पड़ने से, पानी में डूबने से, कार्बन मोनो ऑक्साइड के वातावरण में सांस लेने से आदि। नोट:- (i) जब व्यक्ति के गले पर रस्सी या अन्य समान वस्तु या हाथों से कसने के कारण मृत्यु होती है, उसे गला घोंटना (Strangulation) कहते हैं। (ii) जब गले को हाथ की उंगलियों से दबाकर या कसकर हत्या की जाती है, तो उससे श्वांस अवरुद्ध हो जाती है और मृत्यु हो जाती है। इसे थ्रोटलिंग (Throttling) कहते हैं। (iii) दिमाग की रक्त वाहिकाओं के अचानक फटने से बेहोशी व मृत्यु हो जाने को रक्ताघात (Apoplexy) कहते हैं। (iv) नाक व मुंह को हाथों से या कपड़े से बंद कर देने से मृत्यु हो जाने को स्मादरिंग (Smothering) कहते हैं। (v) श्वसन मार्ग में किसी बाहरी वस्तु या भोज्य पदार्थ से अवरोध उत्पन्न हो जाये और मृत्यु हो जाये तो इसे मुख अवरोध (Gagging) कहते हैं। यह सामान्यतः दुर्घटनावश होता है। (vi) जब ग्रसनी (Pharynx) एवं मुख्य श्वांस नलियों के मध्य कोई बाहरी वस्तु जैसे- भोजन का टुकड़ा या अन्य कोई कठोर वस्तु फंस जाने से वायु की आपूर्ति बन्द हो जाने से मृत्यु हो जाती है, तो इसे चोकिंग (Choking) कहते हैं। ऐसी घटना सामान्यतः बच्चों एवं वृद्ध व्यक्तियों में पायी जाती है। (vii) किसी व्यक्ति को शराब के नशे में करके कोई व्यक्ति उसके सीने पर बैठ जाता है तथा अपने हाथों से उस व्यक्ति का मुंह व नाक बन्द कर देता है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है, इसे बर्किंग (Burking) कहते हैं। (viii) वाहन के नीचे कुचल जाने से या गिरते हुए घर के नीचे दब जाने से या गिरते हुए वृक्ष के नीचे दब जाने से हुई मृत्यु को अभिघातिक श्वांसावरोध (Traumatic Asphyxia) कहते हैं। हत्या के अपराध की विवेचना हत्या के अपराध में तीन प्रकार से अभियोग पंजीकृत होते हैं- (i) जब मृतक ज्ञात हो तथा अभियुक्त नामजद हों, (ii) मृतक ज्ञात हो, अभियुक्त अज्ञात हों, लेकिन गवाहों ने अभियुक्त को देखा हो, (iii) मृतक अज्ञात हों तथा अभियुक्त भी अज्ञात हों। (1) जब मृतक ज्ञात हो तथा अभियुक्त नामजद हों, तब विवेचना का ढंग (i) ऐसे प्रकरणों में हत्या की सूचना मिलते ही तत्काल घटनास्थल पर पहुँचकर घटनास्थल को सुरक्षित किया जाये। (ii) वादी का बयान दर्ज किया जाये तथा उससे घटना के बारे में विस्तार से जानकारी की जाये तथा घटना का मोटिव भी पूछा जाये तथा उसे केस डायरी में लेखबद्ध किया जाये। (iii) यदि कोई घटना में घायल है, तो उसे डाक्टरी परीक्षण हेतु तत्काल भिजवाया जाये। वादी भी यदि घायल है, तो उसे भी मेडिकल परीक्षण हेतु भेजा जाये। (iv) पुलिस की एक टीम अलग से नामजद अभियुक्तगण की तलाश व गिरफ्तारी हेतु भेज दी जाये। (v) घायलों की स्थिति गंभीर होने की दशा में उनका मृत्यु कालिक कथन दर्ज करने हेतु कार्यपालक मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट दी जाये तथा उसका बयान भी दो साक्ष्यों के समक्ष दर्ज कर लिया जाये तथा इन परिस्थितियों का उल्लेख भी केस डायरी में किया जाये। (vi) प्रथम सूचना रिपोर्ट में लिखाए गए गवाहों एवं अन्य स्वतंत्र चश्मदीद गवाहों का भी बयान दर्ज किया जाये। (vii) घटनास्थल पर मृतक का व संपूर्ण घटनास्थल का पास से व दूर से 4-6 फोटोग्राफ विभिन्न कोणों से करा लिया जाये। (viii) मृतक की लाश का पंचायतनामा भरकर उसे सील मोहर करके पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया जाये। (ix) यदि मृतक के कपड़ों पर खून आदि लगा है तो उसे पोस्टमार्टम के बाद सर्वमुहर कर वापस करने हेतु रिपोर्ट डाक्टर को दी जाये। (x) घटनास्थल से भौतिक साक्ष्यों- खूनालूद (रक्त रंजित) व सादी मिट्टी, कारतूस के खोखे, छर्रे, पैलेट्स एवं वैड्स, अभियुक्तों के द्वारा छोड़े गए जूते, चप्पल या अन्य कोई कपड़ा, गमछा, शस्त्र, चाकू आदि कब्जे में लेकर उसकी दो स्वतंत्र गवाहों के समक्ष फर्द बनायी जाये। (xi) घटनास्थल का नक्शा नज़री तैयार किया जाये। (xii) घटनास्थल के आसपास के लोगों से भी पूछ-ताछ कर उनका बयान दर्ज किया जाये। (xiii) घटना के उद्देश्य (Motive) के संबंध में भी साक्ष्य एकत्र करके उसे केस डायरी में लेखबद्ध किया जाये। (xiv) अभियुक्तों के घटना के पूर्व और घटना के बाद के आचरण का साक्ष्य एकत्र किया जाये कि क्या घटना के पूर्व अभियुक्तों ने मृतक को कोई धमकी दी थी, कोई तैयारी की थी, कोई योजना बनायी थी तथा घटना के बाद क्या मृतक केिवारीजन (परिवारजन) को धमकी दी है या कहाँ भाग कर गये हैं? आदि। (xv) अभियुक्तों की गिरफ्तारी का प्रयास करना, न मिलने पर उनके विरुद्ध न्यायालय से धारा 82 व धारा 83 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत आदेश प्राप्त करना व उनकी तामीली करना। (xvi) अभियुक्तों की गिरफ्तारी होने पर उनका कथन दर्ज करना, उनसे हत्या की घटना में प्रयुक्त उपकरण की बरामदगी का प्रयास करना और यदि समय कम हो तथा अभियुक्त हत्या का उपकरण बरामद कराने को कहे तो नियमानुसार उसका पुलिस कस्टडी रिमांड प्राप्त करना। (xvii) यदि अभियुक्त न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करके न्यायिक अभिरक्षा में जेल चला गया है, तो न्यायालय से अनुमति प्राप्त कर उसका जेल में जाकर बयान दर्ज करना और यदि वह हत्या में प्रयुक्त उपकरण बरामद कराने का बयान देता है, तो उसका न्यायालय में प्रार्थना-पत्र देकर पुलिस कस्टडी रिमांड प्राप्त करना और प्रयुक्त उपकरण को धारा 27 भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत बरामद करना। बरामदगी की दो स्वतंत्र गवाहों के समक्ष फर्द तैयार करना तथा उन गवाहों का बयान दर्ज करना। (xviii) पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट में आए मृत्यु के कारण को समझना तथा पोस्ट-मार्टम कर्ता डाक्टर का बयान दर्ज करना। (xix) यदि मृतक का विसरा पोस्ट-मार्टम करने वाले डाक्टर द्वारा सुरक्षित करके दिया गया है तो मुख्य चिकित्साधिकारी से डॉकिट तैयार कराकर विधि विज्ञान प्रयोगशाला को परीक्षण हेतु भेजना, ताकि यह ज्ञात हो सके कि मृतक को जहर तो नहीं दिया गया है। (xx) घटनास्थल से कब्जे में लिए गये प्रदशों (Exhibits) को राजपत्रित अधिकारी से डॉकिट बनवाकर विधि विज्ञान प्रयोगशाला में परीक्षण हेतु भेजना। (xxi) हत्या में प्रयुक्त उपकरणों का भी डॉकिट तैयार कराकर उनका विधि विज्ञान प्रयोगशाला से परीक्षण कराना। यदि हत्या में प्रयुक्त आग्नेयास्त्र (Firearm) बरामद हो जाता है तो घटनास्थल से मिले कारतूसों को उस शस्त्र के साथ विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजकर परीक्षण कराया जाये कि घटनास्थल पर मिले खोखा कारतूस इसी शस्त्र (अभियुक्त से बरामद शस्त्र) से ही चले हैं। (xxii) सभी परीक्षण रिपोर्टों को केस डायरी के साथ संलग्न किया जाना चाहिए। (xxiii) पंचायतनामा के गवाहन का बयान भी दर्ज किया जाये। (xxiv) उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर निष्कर्ष निकालना और नियत समय (90 दिवस) के भीतर आरोप-पत्र (Charge-sheet) प्रेषित करना या अंतिम रिपोर्ट प्रेषित करना। (2) जब मृतक ज्ञात हो तथा अभियुक्त अज्ञात हों, लेकिन गवाहों द्वारा पहचाने गये हों, तब विवेचना का ढंग- ऐसी स्थिति में घटनास्थल पर मौजूद लोगों व चश्मदीद गवाहों से हत्या में शामिल अभियुक्तों का हुलिया जानकारी करके कंट्रोल रूम के माध्यम से उनकी शहर के अंदर व शहर के बाहर जाने वाले मार्गों पर तलाश करायी जाये तथा इसे केस डायरी में भी लेखबद्ध किया जाये। शहर के होटलों, ढाबों धर्मशालाओं, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, मदिरालयों, टैक्सी स्टैंडों तथा गैर आबाद नई कालोनियों में अभियुक्तों की तलाश की जाये। अभियुक्तों के पकड़े जाने पर उनको मौके पर बापर्दा करके उनको बापर्दा ही हवालात में रखा जाये तथा उन्हें बापर्दा स्थिति में ही हत्या में प्रयुक्त उपकरण बरामद करने का प्रयास किया जाये। उनको पंजीकृत अभियोग में प्रकाश में लाते हुए उनके विरुद्ध शेष कार्यवाही प्रथम तरीके से ही की जाएगी। केवल उनकी चश्मदीद गवाहों से कार्यवाही शिनाख्त की कार्यवाही और करायी जाएगी। कार्यवाही शिनाख्त की प्रक्रिया के लिए परिशिष्ट देखिए। (3) मृतक अज्ञात हो तथा अभियुक्त भी अज्ञात हों, तब विवेचना का ढंग- (i) सर्वप्रथम वादी का कथन अंकित करें। (ii) तत्काल घटनास्थल पर पहुँचकर उसे सुरक्षित करें। (iii) घटनास्थल का सूक्ष्म निरीक्षण करके व आसपास की परिस्थितियों से यह जानने का प्रयास किया जाये कि घटना का उद्देश्य क्या है? (iv) घटनास्थल का कई कोणों से फोटोग्राफ करा लिया जाये। (v) आसपास के गांवों एवं पड़ोसी (सीमावर्ती) थानों से भी लोगों को बुलाकर शिनाख्त करायी जाये। (vi) प्रेस व मीडिया के लोगों को भी बुलाकर मृतक का उनसे फोटोग्राफ कराकर फोटो सहित समाचार पत्र में प्रकाशित करने का अनुरोध किया जाय। vii) घटनास्थल पर मृतक के वस्त्रों की तलाशी, हाथ आदि में गोदन चिह्न (Tattoo) आदि देखकर भी पहचान कराने का प्रयास किया जाये। यदि पैन्ट-शर्ट पर आसपास के टेलर का लेबल लगा हो, तो उसे भी बुलाकर अज्ञात मृतक की पहचान करायी जाये। (viii) घटनास्थल पर मौजूद भौतिक साक्ष्यों को संग्रहीत कर लिया जाये। उसकी दो स्वतंत्र गवाहों के समक्ष फर्द बना ली जाये। (ix) मृतक का हुलिया व पहने हुए वस्त्रों को भली प्रकार नोट किया जाये। (x) मृतक का फिंगर प्रिंट भी संकलित करा लिया जाये तथा उसे फिंगर प्रिंट ब्यूरो भेजकर मिलान कराया जाये। (xi) पहचान का हर संभव प्रयास कर लेने के बाद यदि मृतक की पहचान नहीं होती है, तो पूरे शिनाख्त के प्रयास को पंचायतनामा में लिखते हुए पंचायतनामा भरकर शव को सील मोहर करके पोस्ट-मार्टम हेतु भेजा जाये। (xii) जनपद के जिला अपराध अभिलेख ब्यूरो (DCRB) से अज्ञात मृतक की तलाश गश्ती करायी जाये। (xiii) अतिरिक्त पम्फलेट फोटो व हुलिया सहित छपवाकर बस स्टैण्ड, रेलवे स्टेशन, बाहर जाने वाली बसों, भीड़-भाड़ वाले बाजार और आसपास के जनपदों के बस अड्डों, रेलवे स्टेशन, सिनेमा हाल, मॉल आदि के पास चस्पा करवाया जाये। (xiv) यदि मृतक की शिनाख्त हो जाती है तो शिनाख्त करने वाले लोगों से लिखित प्रार्थना-पत्र लिया जाये और उनका बयान केस डायरी में लेखबद्ध किया जाये तथा उनसे मृतक की हत्या किये जाने के कारण व उद्देश्य (Motive) की भी जानकारी करके लेखबद्ध किया जाये। यदि वे जिन लोगों पर हत्या का संदेह जताते हों, तो उनकी गतिविधियों की जानकारी करके उनसे सख्ती से पूछताछ की जाये। (xv) मृतक के निकटस्थ मित्रों, संबंधियों से भी पूछताछ की जाये तथा वह आखिरी बार किसके साथ कहाँ देखा गया था, यह भी जानकारी की जाये। (xvi) मृतक के मृत्यु पूर्व आचरण, उसके कारोबार, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, चरित्र, नशे की प्रवृत्ति, आदि की भी जानकारी की जाये। (xvii) यदि पूछताछ में कोई संदिग्ध व्यक्ति अपराध कबूल कर लेता है तो उसका बयान दर्ज करते हुए हत्या में प्रयुक्त वाहन, उपकरण, अस्त्र-शस्त्र आदि की बरामदगी का प्रयास किया जाये। (xviii) यदि अभियुक्त को चोटें हैं, तो उसका भी मेडिकल परीक्षण कराया जाये। (xix) अभियुक्त के विरुद्ध मृतक की हत्या करने का परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) एकत्र करके उसे केस-डायरी में लेखबद्ध किया जाये। (xx) घटनास्थल से, कब्जे में लिए गये प्रदर्शनों (Exhibits) का विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) से परीक्षण कराया जाये। (xxi) अभियुक्त व मृतक के मोबाइल नंबरों की भी कॉल डिटेल रिपोर्ट (CDR) निकलवाकर घटना के दिन उनकी लोकेशन तथा किससे-किससे, कब-कब बात हुई है, जानकारी करके उपयोगी तथ्य को केस-डायरी में लिखा जा सकता है। (xxii) पंचायतनामा के गवाहन का बयान भी दर्ज करें। (xxiii) यदि साक्ष्य-संकलन से अभियुक्त के विरुद्ध आरोप प्रमाणित हो रहा हो, तो उसके विरुद्ध आरोप-पत्र (Charge-sheet) प्रेषित किया जाये। आरोप-पत्र में प्रत्येक साक्षी के नाम के आगे यह अवश्य अंकित किया जाये कि वह किस कोटि का साक्षी है। मृत्यु का संभावित समय 1. 1 घंटे से कम तो शव का तापमान गर्म होगा 2. 3 घंटे में मृत्युज नीलाभ (पोस्ट-मार्टम स्टेनिंग) के चकत्ते 3. 6 - 8 घंटे में मृत्युज नीलाभ पूर्णतया विकसित एवं स्थिर 4. 12 घंटे में मृत्युज काठिन्य (रिगर मोर्टिस) पूरे शरीर पर उपस्थित, अंधानतरा पर हरे रंग के चकत्ते। 5. 24 - 36 घंटे में शरीर का तापमान ठंडा, मृत्युज काठिन्य या खत्म हुआ, हर रंग पूरे पेट एवं सीने पर, गैस की वजह से पेट का फूलना, मक्खियों के अंडे का प्रकट होना। 6. 48 घंटे में पेट फूला हुआ, चेहरे का फूलना, छालों का प्रकट होना, मैगट का दिखाई देना। 7. 72 घंटे में शरीर पूर्ण फूला हुआ, आकृति अस्पष्ट होना। 8. 07 दिवस (एक हफ्ते) में आंतों एवं अन्य पेट के अंगों का सड़ना। 9. 2 हफ्ते में मुलायम ऊतकों का पूर्ण परिगलन 10. 01 - 03 माह में शव की अस्थियों का अवशेष लेखक दीपक कुमार पटेल अधिवक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद संस्थापक एवं मुख्य अधिवक्ता पटेल लॉ चैंबर्स फ्री कंसल्टेशन: 9455397103

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