भारतीय कानून कैसे पुरुषों के साथ भेदभाव करते हैं? How Indian Law's Punish Men's
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भारतीय कानून कैसे पुरुषों के साथ भेदभाव करते हैं? How Indian Law's Punish Men's

DEEPAK KUMAR PATEL ADVOCATE HIGH COURT ALLAHABAD 7 July 2026

आज मैं भारत के कुछ ऐसे कानून के बारे में बताने वाले हैं जिससे आपको जानकर हैरानी होगी कि भारतीय कानून पुरुषों के साथ कितना नाइंसाफी करता है भारत का संविधान जहां भारत के हर सिटीजन को समानता का अधिकार देता है वहीं भारतीय दंड संहिता यानी कि इंडियन पेनल कोड या भारतीय न्याय संहिता को अगर आप गौर से देखेंगे तो आपको साफ दिखाई देगा कि पुरुषों से महिलाओं की सुरक्षा के लिए तो हर तरह के कानून बने हुए है लेकिन जब बात महिलाओं के द्वारा पुरुषों पर किए गए अपराधों की आती है तो इसी इंडियन पेनल कोड या भारतीय न्याय संहिता के कानून और आर्टिकल अपने कदम पीछे खींच लेते हैं अगर हम घरेलू हिंसा का उदाहरण ले तो ऐसा माना जाता है कि घरेलू हिंसा के 100 केसों में से 40 केस पुरुषों के खिलाफ होते हैं लेकिन कभी भी इस डाटा को सही नहीं ठहराया जा सकता और ऐसा इसलिए कि अधिकतर पुरुष अपने खिलाफ होने वाले घरेलू हिंसा जैसे अपराध को रिपोर्ट ही नहीं करते हैं तो इससे यह बात बिल्कुल सही है कि महिलाओं और पुरुषों के खिलाफ होने वाले घरेलू हिंसा की अपराध की गहराई अलग अलग होती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पुरुषों के खिलाफ होने वाले डोमेस्टिक वायलेंस या घरेलू हिंसा को अपराध ही ना माना जाए ऐसा संभव है कि बहुत से लोगों को यह बात सही ना लगे कि एक शादी या रिलेशनशिप में रहने वाली महिला से ज्यादा पुरुष प्रताड़ित होते हैं और इस बात को 2021 के एनसीआरबी या नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के डाटा भी सपोर्ट करता है।

आज मैं भारत के कुछ ऐसे कानून के बारे में बताने वाले हैं जिससे आपको जानकर हैरानी होगी कि भारतीय कानून पुरुषों के साथ कितना नाइंसाफी करता है भारत का संविधान जहां भारत के हर सिटीजन को समानता का अधिकार देता है वहीं भारतीय दंड संहिता यानी कि इंडियन पेनल कोड या भारतीय न्याय संहिता को अगर आप गौर से देखेंगे तो आपको साफ दिखाई देगा कि पुरुषों से महिलाओं की सुरक्षा के लिए तो हर तरह के कानून बने हुए है लेकिन जब बात महिलाओं के द्वारा पुरुषों पर किए गए अपराधों की आती है तो इसी इंडियन पेनल कोड या भारतीय न्याय संहिता के कानून और आर्टिकल अपने कदम पीछे खींच लेते हैं अगर हम घरेलू हिंसा का उदाहरण ले तो ऐसा माना जाता है कि घरेलू हिंसा के 100 केसों में से 40 केस पुरुषों के खिलाफ होते हैं लेकिन कभी भी इस डाटा को सही नहीं ठहराया जा सकता और ऐसा इसलिए कि अधिकतर पुरुष अपने खिलाफ होने वाले घरेलू हिंसा जैसे अपराध को रिपोर्ट ही नहीं करते हैं तो इससे यह बात बिल्कुल सही है कि महिलाओं और पुरुषों के खिलाफ होने वाले घरेलू हिंसा की अपराध की गहराई अलग अलग होती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पुरुषों के खिलाफ होने वाले डोमेस्टिक वायलेंस या घरेलू हिंसा को अपराध ही ना माना जाए ऐसा संभव है कि बहुत से लोगों को यह बात सही ना लगे कि एक शादी या रिलेशनशिप में रहने वाली महिला से ज्यादा पुरुष प्रताड़ित होते हैं और इस बात को 2021 के एनसीआरबी या नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के डाटा भी सपोर्ट करता है। एनसीआरबी का डाटा 2021 के अनुसार लगभग 1 साल में 164033 लोगों ने पूरे देश में आत्महत्या किया लेकिन जब इन नंबरों को डिकोड किया गया तो पता चला की आत्महत्या करने वालों में करीब 81,063 लोग शादीशुदा व्यक्ति थे जबकि शादीशुदा महिला की संख्या मात्र 28,680 ही थी आप इस डाटा से समझ सकते हैं कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादा मानसिक दबाव झेलते हैं जिसमें उनकी फैमिली और शादीशुदा जिंदगी से संबंधित समस्याएं सबसे ज्यादा होते हैं और इसलिए वह सामाजिक दबाव और अपने खिलाफ होने वाले हरासमेंट को झेलना या शेयर करने के बजाय आत्महत्या को चुनते हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि अगर यह हरासमेंट पुरुष के द्वारा किया गया होता तो पुलिस या कानून उनकी मदद के लिए तैयार नहीं होगा साथ ही इसके अलावा मेल रेप, हरासमेंट एट वर्किंग प्लेस यानि कि कार्यस्थल पर शोषण करना, लिव इन रिलेशनशिप और कुछ सालों पहले तक एडल्ट्री के मामलों में भी पुरुषों के कानूनी अधिकार महिलाओं से बहुत कम नजर आते हैं अब हम यह समझाएंगे की कैसे लिंग आधारित भेदभावपूर्ण कानून जो भारतीय पुरुषों के लिए एक हद तक खतरनाक बनते जा रहे हैं तो अगर हम देखें तो भारत में शादी के 7 साल के भीतर अप्राकृतिक कारणों की वजह से मृत्यु हो जाती है तो इसे दहेज मृत्यु के नाम से यह हमारे कानून में देखा जाता है। और सारा ब्लेम पति के साथ उसके परिवार व रिश्तेदार पर डाल दिया जाता है जिससे पति के साथ परिवार के लोगों को भी सजा होती है लेकिन जब एक शादी शुदा पुरुष 7 साल के भीतर आप प्राकृतिक कर्ण की वजह से सुसाइड यानी की आत्महत्या करता है तो ना तो उसे दहेज मृत्यु का नाम दिया जाता है ना ही उसकी पत्नी को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार माना जाता है चाहे भले ही पुरुष सुसाइड लेटर में अपने पत्नी या सास ससुर को ब्लेम करके क्यों ना मरा हो, सावे इंडियन फैमिली फाऊंडेशन की माने तो साल 2006 से 2015 के बीच लगभग 1,82,583 शादीशुदा पुरुष ने घरेलू हिंसा की वजह से आत्महत्या किया, देखा जाए तो इस घरेलू हिंसा में शारीरिक झड़प, मानसिक क्रूरता, भावनात्मक क्रूरता, आर्थिक क्रूरता और यौन क्रूरता जैसे फैक्टर शामिल है क्योंकि पुरुषों के खिलाफ होने वाले अधिकतर मामले मीडिया सोशल मीडिया व पुलिस के द्वारा इग्नोर कर दिया जाता है इसलिए शायद ही आपको पता हो कि हर साल हजारों पुरुषों को भी जिंदा जलाने के मामले होते हैं एनसीआरबी के दाता के अनुसार हर साल 3300 से अधिक पुरुष जिंदा जला दिए जाते हैं लेकिन यह केसेस भारतीय न्याय संहिता के धारा 304 B के तहत रिपोर्ट नहीं होते क्योंकि 304 B सिर्फ पत्नी के आप प्राकृतिक मृत्यु पर ही पति को दोषी ठहराने के लिए बना है। हम अपनी बात आगे बढ़े उससे पहले आप सभी के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना यह है कि पटेल लॉ चैंबर्स शुरू कर रहा है हमारा कानून नाम का एक विशेष संवाद कार्यक्रम जिसमें आप जान सकेंगे अपने सभी सवालों का जवाब जिसमें आप पूछ सकते हैं पटेल लॉ चैंबर्स के अनुभव भी अधिवक्ताओं से अपनी कानूनी समस्याओं का हाल जिसका टोल फ्री नंबर है 9455397103, 9305269489 इसी नंबर पर व्हाट्सएप के माध्यम से भी अपने सवाल पूछ सकते हैं या patelchamberslaw@gmail.com पर पूछ सकते है। हां तो यह हो गई घरेलू हिंसा की बात अगर मेल रेप या पुरुषों के साथ होने वाले बलात्कार की बात करें तो बलात्कार भारत में चौथा सबसे बड़ा अपराध है जिसकी अवधारणा यह है कि जिसमें फीमेल विक्टिम हो यानी कि सिर्फ महिला ही पीड़ित होनी चाहिए और पुरुष अपराधी होगा, देखा जाए तो उसे सोशल कॉन्सेप्ट की वजह से पुरुषों के खिलाफ होने वाले बलात्कार को लगभग असंभव माना जाता है और इसलिए आज भी भारत में ऐसे होने वाले अपराध के लिए कोई प्राकृतिक कानून नहीं है लेकिन महिलाओं के पास ऐसे किसी भी अपराध के लिए पुरुषों को अपराधी घोषित करना बहुत आसान है जो कि शायद जरूरी भी है क्योंकि भारत में महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं लेकिन यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या यह बढ़ते बलात्कार के मामले क्या सच में पूरी तरह से पुरुषों की गलती है या फिर महिलाओं के मिले कुछ अधिकारों का मिस यूज भी हो रहा है। देखिए हम ऐसा कुछ भी क्लेम नहीं कर रहे हैं कि जो भी बलात्कार के केसेस दर्ज होते हैं वह सच है या झूठ है लेकिन इस डाटा को देखिए आज भारत में दर्ज होने वाले 75% बलात्कार के मामले में आरोपी को न्यायालय के द्वारा निर्दोष घोषित कर दिया जाता है आपको जानकर हैरानी होगी कि साथ 2012 तक बलात्कार के मामलों में भारी होने वाले लोगों का प्रतिशत सिर्फ 46% था लेकिन दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप के जघन्य अपराध के बाद रेप के कानून को और मजबूत किया गया और यह महिलाओं के लिए और भी आसान बना दिया गया ऐसे में 2013 की शुरुआती 8 महीना में दर्ज होने वाले बलात्कार के मामलों में से भारी होने वाले आरोपियों का परसेंटेज 75% हो गया लीगल एक्सपर्ट भी बढ़ते हुए एक्विट्टल केसेस को फॉल्स रेप केस को जिम्मेदार मान रहे हैं जिसमें कोई महिला किसी पुरुष के खिलाफ गुस्से में या बदले की भावना में एफआईआर दर्ज कर देती है जिसमें बरी होने वाले पुरुषों की संख्या बढ़ी हो लेकिन उन्हें इस पूरे प्रोसेस में सोशल मीडिया ट्रायल से होकर गुजरना पड़ता है जिसे शायद ही कहीं दर्ज किया जाता हो ऐसे में आज भी पुरुष के खिलाफ होने वाले बलात्कार को हमारे देश में कुछ भी नहीं समझा जाता है झूठे बलात्कार के केसेस में पुरुषों का आर्थिक तथा सामाजिक स्टेटस को नुकसान पहुंचाना बहुत आसान है बलात्कार के अलावा कार्यस्थल पर होने वाले हरासमेंट, लिव इन रिलेशनशिप और कुछ सालों पहले तक एडल्ट्री के मामलों में भी पुरुषों के कानूनी अधिकार महिलाओं से कम नजर आते हैं ऐसे में यह समझते हैं कि कौन-कौन से कानून है जो समान अपराध की अवस्था में पुरुषों को सजा तो देते ही है लेकिन महिलाओं के खिलाफ केस तक दर्ज नहीं होता है। लिंग आधारित भेदभाव पूर्ण कानून में तो सबसे पहले दहेज प्रतिषेध कानून है जो आज शादीशुदा पुरुष के लिए आत्महत्या किए जाने का जिम्मेदार बनता जा रहा है आपको बता दे कि भारत में दहेज के लेन-देन को सबसे पहले 1961 में दहेज प्रतिषेध अधिनियम कानून में लाया गया इसके तहत दहेज मांगना और दहेज देना दोनों का अपराधीकरण किया गया और बाद में भारतीय न्याय संहिता की धारा 498 A को प्रस्तुत किया गया क्योंकि जनरली पत्नी के प्रति होने वाले क्रूरता को रोकने के लिए जिसमें पति और उसके परिवार वालों को 3 साल तक करवा का प्रावधान है साथ ही साथ इस सपोर्ट करते हुए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113 B और भारतीय न्याय संहिता की धारा 304 B यह कहते हैं की शादी के 7 साल के अंदर कोई महिला आत्महत्या करती है तो यह मान लिया जाएगा कि उसकी मौत के पीछे उसके पति या परिवार का हाथ है और इसे दहेज मृत्यु माना जाएगा आपको जानकर हैरानी होगी कि 2014 तक भारतीय न्याय संहिता की धारा 498 A के तहत सिर्फ महिला के शिकायत पर ही उसके पति और परिवार वालों को बिना किसी वारंट और इन्वेस्टिगेशन या जांच के गिरफ्तार किया जाता था साथ ही यह धारा गैर जमानती भी था यानी कि पति या परिवार को जमानत भी मुश्किल से मिलती थी लेकिन 2 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने ऑटोमेटिक अरेस्ट को खत्म कर दिया और पुलिस को आदेश दिया कि दहेज उत्पीड़न के मामले में आरोपी को तभी गिरफ्तार किया जाए जब बहुत जरूरी हो इस कानून की आलोचना इस बात पर होती है कि पारंपरिक कानूनी आधारों का अनुसरण नहीं करता जैसे हमारे कानून में कहा जाता है कि कोई भी आरोपी तब तक अपराधी नहीं है जब तक की यह सिद्ध नहीं हो जाता है कि वह अपराधी है। इस कानून का विरोध करते हुए सावे इंडिया फैमिली फाउंडेशन के स्पोक पर्सन यह कहते हैं कि कानून का गलत इस्तेमाल अधिकतर काम इनकम वाले पुरुषों के साथ होता है क्योंकि इस कानून के तहत यह मान लिया जाता है कि महिलाएं सदैव सच बोलता है और इसलिए इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता कि सच क्या कह रहे हैं आपको जानकर हैरानी होगी कि कोलकाता हाई कोर्ट के द्वारा इस कानून के गलत उपयोग को कानूनी आतंकवाद या लीगल टेररिज्म तक कहा जा चुका है यहां तक की इस कानून की आलोचना खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी की है सुप्रीम कोर्ट ने 2 जुलाई 2014 को एक केस की सुनवाई के दौरान कहा कि कानून का उपयोग गलत तरीके से कुछ महिलाएं अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ उनको परेशान करने के लिए किया जा रहा है जिसके बाद से तो ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से तो कमी आई लेकिन उसके बावजूद पुरुषों के ऊपर लगाए गए गलत आरोप जिसमें उनकी नौकरी और सामाजिक स्टेटस को नुकसान पहुंचता है उसकी भरपाई के लिए कोई कड़े कदम नहीं उठाए गए और आज भी कई केसेस मैं महिलाओं द्वारा पत्तियों को परेशान किया जाता है और पुरुष विरोध करते हैं तो उनको सबक सिखाने के लिए धमकी दी जाती है इससे बचने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचता तो वह सुसाइड यानी की आत्महत्या को चुन लेते हैं इस मामले पर दीपिका भारद्वाज की डॉक्यूमेंट्री जिसका शीर्षक मार्टीर्स आफ मैरिज उन पुरुषों की दशा और उनकी खराब अवस्था को दिखाती है जो की 498 ए भारतीय न्याय संहिता की धारा का गलत उपयोग किया जाता है एक यह एक जरूरी विजुअल डॉक्यूमेंटेशन है जिसे आप लोग भी देखेंगे तो स्थिति और साफ दिखाई देगी। दहेज प्रतिषेध अधिनियम के बाद एंटी रेप लॉ की बात करें तो भारत में वूमेंस के खिलाफ बढ़ते रेप केसेस को कम करने के लिए रेप के खिलाफ कड़े कानून है लेकिन आईपीसी की धारा 375 के तहत रेप विक्टिम हमेशा वूमेन होगी और अपराधी हमेशा एक पुरुष होगा यह कानून भारत में पुरुषों को रेप विक्टिम मानता ही नहीं सिर्फ धारा 377 के तहत ही पुरुष को रेप विक्टिम माना जा सकता है वह भी तब जब किसी मामले में मेल विक्टिम के साथ आरोपी भी मेल हो यानी कि किसी भी कंडीशन में भारतीय कानून यह मानने को तैयार नहीं है कि कोई महिला भी किसी पुरुष का रेप कर सकती है दरअसल इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि रेप के लिए पुरुषों का आर्राउस्ड होना जरूरी है जो की जोर जबरदस्ती की कंडीशन में पॉसिबल नहीं है लेकिन 1982 में एक हैरान करने वाली स्टडी सामने आई जिसमें फ्लिप एम सरेल तथा विलियम एच मास्टर्स ने कंडक्ट किया जिसमें देखा जाए तो इसमें 11 ऐसे पुरुषों पर कंडक्ट किया गया जो महिलाओं के द्वारा सेक्सुअल ह्रास किए गए थे अपमान , चिंता, डर में होने के बावजूद भी उन लोगों ने सेक्सुअल रिस्पांस किया ऐसे में कंसेंशुअल रिलेशन कंसीडर किया जा सकता है लेकिन ऑथर्स ने इसे कंडक्ट किया कि एंजायटी की वजह से भी लोगों में सेक्सुअल अराउजल पॉसिबल था भारत में किए गए एक सर्वे में पाया गया की 2022 भारतीय पुरुषों में से 16% लोगों ने कहा कि उन्हें कई बार जबरदस्ती सेक्स करना पड़ता है इसके बावजूद की मेल रेप को भारत में क्राइम नहीं माना जाता इसका यह कारण है कि महिला की तुलना में पुरुष रेप के बारे में कम रिसर्च होना आईपीसी की तुलना में धारा 7375 को लिंग आधारित भेदभाव कानून माना जाता है क्योंकि इसमें महिलाओं को ही विक्टिम माना जाता है जिसके मिस उसे पर हम पहले ही बात कर चुके हैं कि कैसे देश में गलत रेप के कैसे बढ़ रहे हैं। कानून यह कहता है कि पुरुष किसी महिला के साथ बिना उसकी मर्जी से इंटरकोर्स करता है तो उसे रेप माना जाएगा लेकिन यहां पर उसे महिला जो रेप का आरोप लगा रही है उसे प्रूफ करने यानि सिद्ध करने का कोई गाइडलाइन नहीं है यानी यहां संभव है कि कोई महिला सहमति से सेक्स करने के बाद भी अपने पार्टनर पर इल्जाम लगा सकती है कि उसने महिला के साथ रेप किया है साथ ही रेप विरोधी कानून के कुछ स्थिति की बात करें तो आईपीसी की धारा 376 B,C,D भी भेदभावपूर्ण नजर आते हैं जिसमें किसी हाई पोजिशन पर बैठा कोई पुरुष अधिकारी उसके साथ काम करने वाली किसी महिला के साथ बहला फुसला कर शारीरिक संबंध बनाता है तो यह संभव है कि वह जेल चला जाय जबकि ऐसी अवस्था में कोई महिला पुरुष के साथ प्रमोशन के लिए शारीरिक संबंध बना लेती है तो उसके खिलाफ कोई भी कार्यवाही नहीं होती है इन सब के अलावा कोई पुरुष किसी महिला के साथ शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाता है तो उसके साथ ब्रेकअप नहीं कर सकता वरना इसे एक तरह का बलात्कार समझा जाएगा और जेल भी जाना पड़ सकता है लेकिन जब कोई महिला पुरुष के साथ शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बना कर भाग जाती है तो वहां महिला पर कोई बलात्कार का चार्ज नहीं लगेगा साथ ही साथ पुरुषों में उम्र की सहमति को भी क्लियर नहीं करता है यानी अगर 16 साल की लड़की किसी 16 साल के लड़के के साथ सहमति के साथ शारीरिक संबंध बनाती है तो भी 16 साल के लड़के के ऊपर रेप चार्ज लगाया जा सकता है अगर धारा 354 को देखें तो यह भी महिलाओं के साथ होने वाले छेड़छाड़ और उसकी लज्जा भंग को नुकसान पहुंचाने वाले इरादे से किए गए हमले को अपराध मानने वाला कानून है लेकिन यही महिला किसी पुरुष के साथ या महिला के साथ करती है तो उसे अपराध नहीं माना जाता है और इन्हीं कारणों से एंटी रेप कानून का कआलोचना होता रहता है और उसे लिंग आधारित भेदभाव कानून के नाम से जाना जाता है कुछ सालों पहले तक एडल्ट्री को एक क्रिमिनल ऑफेंस माना जाता था तब यह कानून सिर्फ पुरुषों को सजा देने के लिए होते थे इसमें महिलाओं के खिलाफ कोई चार्ज नहीं लगते थे इसी तरीके से आप ऑफिस में होने वाले हरासमेंट के खिलाफ कानून है जबकि वहीं किसी पुरुष को किसी महिला मित्र या महिला बॉस के द्वारा मानसिक या बोलकर या सेक्सुअल टॉर्चर होता है तो कोई कानून नहीं है देखा जाए तो आज तलाक के बाद चाइल्ड कस्टडी पर भी कानून महिलाओं के पक्ष में खड़ा होता है क्योंकि चाइल्ड कस्टडी तब तक पिता को नहीं मिलती जब तक यह सिद्ध ना हो जाएगी बच्चों की मां मानसिक रूप से डिस्टर्ब है इसलिए बहुत से केसेस में महिलाएं सालों तक अपने तलाकशुदा पार्टनर से बच्चों को दूर कर देती है इस तरह के और भी कानून है जहां दूसरी और पुरुषों को पूरी तरह से इग्नोर कर देते हैं और इन्हीं सब कर्म से चर्चा हो रही है कि महिला आयोग की ही तरह पुरुष आयोग भी बनाया जाए ताकि जो मुद्दे बहुत संवेदनशील टाइप के बने हुए हैं और जहां पर पुरुषों के खिलाफ होने वाले अपराध को समाज में अस्वीकार कर दिया जाता है उस पर एक बेहतर अनुसंधान और जांच की जा सके साथ ही 1990 से पुरुष अधिकार यात्रा भारत में चल रहे हैं देखा जाए तो ह्यूमन राइट की बात करने तथा उनके लिए काम करने वाले फाउंडेशन सेव इंडिया फैमिली फाउंडेशन ने कुछ सालों पहले घरेलू हिंसा से शिकार होने वाले पुरुषों के लिए एक ऐप भी बनाया था जिसके जरिए ऐसे पुरुष अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते थे जिस पर महिलाओं द्वारा पुरुष पर अत्याचार किए जा रहे थे सेव इंडिया फैमिली फाउंडेशन के प्रमुख अमित कुमार ने बताया कि जैसे उनका हेल्पलाइन जारी हुआ वैसे ही 50 दिनों के अंदर ही 16000 से ज्यादा फोन कॉल आए जो पुरुषों पर किए जाने वाले अत्याचार थे जिसमें जाहिर है कि बहुत से मामले नकली भी हो सकते हैं लेकिन अगर 50% सही माने तो भी यह बहुत सीरियस अवस्था है यानी संभव है कि इन सब बातों को फेमिनिस्ट विचारधारा के तहत गलत ठहराया जाए लेकिन हमने जितने कानून की बात की है उसमें अगर पुरुषों को निकाल दे तो लिंग आधारित भेदभावरहित कहा जा सकता है हमें यह बात भी समझ लेना चाहिए कि इन सभी कानों की आलोचना करने का मतलब यह नहीं है कि महिलाओं के लिए इन कानून को खत्म कर देना चाहिए या फिर इसके अंतर्गत दी जाने वाली सजा को कम कर देना चाहिए बल्कि आज महिलाएं भारत में आगे बढ़कर हर क्षेत्र में आगे बढ़ पा रही है तो उन्हें कानून के द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा बड़ा कारण है ऐसा इसलिए क्योंकि आज भी शहरों को छोड़कर बहुत से ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है यानी पितृसत्तात्मक का बोलबाला है ऐसे में हर संभावित कानून के जरिए महिलाओं को प्रोटेक्ट करना और उनकी भागीदारी को बढ़ाना कानून की जिम्मेदारी होनी चाहिए लेकिन साथ ही साथ पुरुषों को भी पूरे तरीके से इग्नोर नहीं करना चाहिए इस बात से कोई भी शंका नहीं है कि भारत की महिलाएं सदियों से सफर करती आई है और आज भी महिला सशक्तिकरण की दिशा में बहुत कुछ करने की जरूरत है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि समाज में शक्ति संतुलन कहीं ना कहीं बदल रहा है और इसी बदलते हुए समय में एक और जहां महिला सशक्तिकरण हो रही है वहीं कुछ खास मामलों में सशक्तिकरण के लिए बनाए गए टूल्स और कानून का गलत इस्तेमाल भी हो रहा है लिंग आधारित समानता सही मायने में तब आएगी जब महिला और पुरुष एक साथ सुरक्षित और साफ वातावरण में रहकर काम कर सके साथ ही बराबर मौका मिले इसलिए जरूरी है ऐसे सुरक्षित नियमों की जहां सही मायने में कानून के आगे दोनों लिंग सुरक्षित महसूस करें महिला सशक्तिकरण का मतलब कभी भी पुरुषों का महत्व को कम करना नहीं हो सकता और इस तरह की फीलिंग डेवलप हो रही है जो हम कहीं ना कहीं महिला सशक्तिकरण के अपने मुख्य गोल से दूर ही जा रहे हैं क्योंकि यह अनुभव महिला सशक्तिकरण को एक सेट बैक देती है यानी कि पीछे धकेल देती है जब सही व्यक्ति को भी सामाजिक रूप से महत्वाकांक्षी कहकर उस पर आरोप लगता है तो ऐसे में जरूरी या है कि सरकार न्यूट्रल कानून यानी की ऐसा कानून बनना चाहिए जिससे किसी भी लिंग को भेदभाव ना महसूस हो इस पर फोकस करें कि जो ऐसे भेदभाव कानून की वजह से समाज में अलगाव हो रहा है उनमें अब संशोधन लाकर कानून में बदलाव करें जिसमें महिला और पुरुष दोनों मिलकर आगे बढ़ सके। लेखक के यह अपने विचार हैं इससे कोई भी व्यक्ति सहमत हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है लेखक का उद्देश्य मात्र यह है कि भारत के ऐसे कानून के बारे में लोगों को जानकारी दें कि मुख्य रूप से कौन ऐसे कानून है जो भारतीय पुरुषों के खिलाफ है मुख्य रूप से जिन धाराओं की बात लेखक ने किया है उन धाराओं को लेकर समाज में बहुत चिंता व्याप्त है ऐसे में लेखक के अपने निजी विचारों व अनुभवों से इस लेख को प्रस्तुत किया गया है जो आए दिन न्यायालय में लेखक खुद ऐसे केसेस की पैरवी करता है जहां पर दहेज हत्या जैसे फेक केसेस में बेल दिलाना या F.I.R. को रद्द करने जैसी प्रक्रिया में शामिल रहा है।
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DEEPAK KUMAR PATEL ADVOCATE HIGH COURT ALLAHABAD
Advocate, Patel Law Chambers | Allahabad High Court

Expert legal professional at Patel Law Chambers with deep experience in Criminal Law.

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